Lovely world

Monday, July 13, 2020

हम तुम

एक सवाल है तुमसे
हरदम कहता है यूं
क्या तुम ,तुम ही हो
या फिर मैं भी हूं तुझमें
क्या तुम ही हो
या फिर मात्र चेतना
जो भी हो शायद
पर वो हो जो
हर पल मेरा था और मैं उसका....

क्यों है घना अंधेरा
क्या वो तुम ही हो जो
जल रहे हो मद्धम मद्धम
या फिर मैं भी हूं उसमें
जो पल पल मिट रहा है हरदम
वह जो उठ रही चमक
क्या वह दीपक तुम ही हो या,
मैं भी हूं तुममे
वह बाती जलती सी
जिसकी वजह से हो तुम

क्यों विपिन है भीगा भीगा
बिखरे हो क्या यहां
चमक उषा हो या कण शीता की
या तुम मोती वसुंधरा की
क्या तुम ही हो केवल "रत्ने"
या फिर मैं भी हूं
जिस से लिपट कर
तुम माणिक सजे

क्या फिर से तुम
तुम ही रहोगे
या कभी कहोगे
मैं ,मैं नहीं तुम ,तुम नहीं
बस केवल हम तुम।

Tuesday, June 02, 2020

कुछ तो लिखो


क्या लिखूं
कहते हो कुछ तो लिखो मुझ पर
क्या कहूं
तुम ही मेरी कविता हो
शायद देता तुम्हें कोई उपमा
पर
 मेरे लिए तुम अनुपमा हो ।
 क्या लिखूं कहते हो कुछ तो लिखो ।।

मैं तो बस एक पतवार
पर तुम ही मेरी मझधार हो,
मैं जो अब तक था
नीःरस
तुम ही तो मेरा श्रृंगार हो।।
करता तुम्हारी तुलना 
किसी मूरत से,
पर तुम तो जीवन रस का भंडार हो।
क्या लिखूं तेरे लिए
तुम तो मेरे जीवन का आधार हो ।।

Monday, June 01, 2020

दादा टीबी और रेडियो

दादा बैठे हैं दरवज्जे पर
पोते पोते खेल रहे अंगना
दो चाचा बूनते हैं खटिया 
बाबा खेतन में जोते जुहा।

बड़की चाची लाई जो है रेडियो
पिछले साल मुकलाने में,
दादा चाचा लड़ते हैं अक्सर,
रखने उनको अपने सिरहाने में।

बाबा को फुर्सत नहीं है,
दौनी खेत जुहाने से
अम्मा सोचे कब छुट्टी मिले
चूल्हा चौका औ काम घराने से।

एक दिन पूछा दादा ने
बबुआ ।यह टीवी क्या होता है? ,
क्यों कहता है बार बार रेडियो में,
टीवी से घर  सजाता है।
कहते हैं दिखती इसमें है
चलती फिरती चित्र सदा ।
चिड़िया बगिया मे उड़ती 
नदिया बहती इसमें साक्षात यहां ।

मन मेरा कहता है बेटा
एक बार टीबी दिखलाने को।
अगर मिले कहीं तुझको टीबी
ले चल मुझे दिखाने को।

छोटा कहता है, हां बापू मैंने भी देखा है उसको
शहर की बड़ी दुकानों पे।
लगता बड़ा सुंदर है मनोरम
आवाज मधुर है कानो में।

इस बार अगर बरखा हो अच्छी
अच्छे दाम मिलेंगे आनो में।
जब जमा हो दो चार पैसे 
खरीद लाएंगे टीवी
मिलकर देखेंगे सब टीवी मुस्कानों से।

सुन दादा का रोम-रोम रोमांचित हो जाता
इस बार फसल के लहलहाने की
मन में एक स्मृति सजाता।
हर रोज ले हाल बाबा से खेती का
हर रोज सपनों में खो जाता।
ऐसा लगता ज्यो जान बसती हो
इस विकट सपने को पाने को।
अहा। इस बार बारिश का रुख कुछ है अलग
लगे खेत लहराने को।
खेतों में गेहूं है मचले
टूट टूट कर अन्न बन जाने को।

बाबा लेटे-लेटे देखे आंखों से सपना,
घर भरा हो अन्न धन धान से ।
चाचा दादा स्वप्न सजाए,
टीवी के बड़े अरमान से।

एक शाम सहसा रेडियो
कानों में दादा के बोला।
तू तो है संगी मेरा
पर उस बेरहमी टीवी की खातिर,
क्यों मुझसे है नाता तोड़ रहा।
तुझे नहीं पता,
वह मुझ जैसा, तेरा साथ नहीं निभाएगा
वह तेरे हाथों में मुझ जैसे
घर से खेतों में, खेतों से पनघट तक नहीं जाएगा।
मांगेगा तुझसे दाना पानी,
 बिजली भी बहुत खाएगा।
मैं तो हूं तेरा सच्चा साथी
अगर मर जाएगी मेरी बैटरी
फिर भी मरता मरता मीठे स्वर सुनाऊंगा।
दादा बोला सुन रेडियो क्यों ऐसे भरमाता है।
टीवी तेरा भैया ,आएगा तो ऐसे क्यों घबराता है?

बोला रेडियो, मेरा मान तुम सब के बीच फिर घट जाएगा
मीठे मीठे मधुर संगीत सुनने पास न मेरे कोई आएगा
मैं हो जाऊंगा अकेला कोई मुझे ना चाहेगा
जो अकेला पड़ जाऊंगा जीते जी मर जाऊंगा।
सुन रेडियो की दशा, दादा मन में उकसाते हैं
अंतर्मन की उसकी व्यथा से थोड़ा सा घबराते हैं।

पर चाहत है अति प्रबल, चलचित्र देखने की
जो तुम पूरी ना कर पाओगे।
तुम मुझे वह रोमांच भला, बताओ कैसे दे पाओगे?
क्या तुम मेरी दशा बताओ दूर कर पाओगे?
रेडियो सुन थोड़ा सा आहत हुआ
चुप होकर 
सहमा कर मौन तकिए के कोने में जा पड़ा।

क्रोध अग्नि  में वह अंदर ही अंदर जलता जाता है।
अनिष्ट ना करना चाहते हुए भी अनिष्ट कर जाता है।
जब दादा चालू करते रेडियो,
तमस खाकर वह भविष्यवाणी कर जाता है।
रात होगी अतिवृष्टी तेरे खेतों में 
जा देख अब तू क्या कर पाता है?
जा बचाने फसल अपनी, 
क्यों सपनों में क्षण गवाता है ।

ज्यो ही सुना दादा बाबा चाचा ने
रातों में ही खेतों में दौड़ पड़े।
लगे जल्दी-जल्दी खेतों में अपनी
हसुआ से गेहूं के पके हुए सब तान काटे।
पर शाप रेडियो का ना विफल हुआ
तभी अचानक आंधी बरसा लगे बरसने
किया तबाही का ऐसा मंजर
आधे फसलों का ना फल हुआ।
ना हुआ मुनाफा, लागत ही मुश्किल से फला।
बाबा के जो बड़े-बड़े थे सपने,
अंबर से फिर मही पर ही आ मिला।

पर दादा मौन पड़े चुपचाप दलानी में
कुछ बोल नहीं पाते हैं।
टूटते देख सपना चलचित्र टीवी  का,
कुछ बेसुध से हो जाते हैं।
पर पीड़ा अपने मन की, हलाहल की तरह पी जाते हैं।

कानों में,
बजता मधुर संगीत सरगम 
 कोने में, छुपा रेडियो जब उठाते हैं।
छोड़ सपना टीवी का, वो संगीत में रम जाते हैं।
थोड़ा गम हल्का होता है, फिर थोड़ा मुस्काते हैं।
इसी तरह फिर से 
बाबा चाचा दादा सब रेडियो के संग ही मिल जाते हैं।
सब रेडियो के संग ही मिल जाते हैं।


                      ।। भास्कर।।

Saturday, May 30, 2020

मैं तेरी परवाह करता हूं

अभी लेटा था बस  मैं,
सोचा तुम्हें मैसेज करता हूं,
पुराने दिन याद आ गए जिनमें
तुम से ढेर सारी बात करता हूं।
हां ! मैं तेरी परवाह करता हूं।।

तुमसे मिलने के लिए,
याद वो कॉलेज के बंक करता हूं।
फिर तुम्हारे साथ
याद वह लंच करता हूं।
सपना टूटने से डरता हूं,
पता नहीं ये सब क्यू करता हूं?
हां ! मैं तेरी परवाह करता हूं ।

रात भर जगता हूं
अक्सर टेरिस पर फिरता हूं ‌
चांद को तकता हूं,
अपने चांद को मिस करता हूं।
हां ! मैं तेरी परवाह करता हूं।

तुमसे बात करने को बेताब रहता हूं।
मन मेरा भी नहीं करता खुद को रोकने का,
फिर भी खुद को रोका करता हूं,
‌लगता है खुद से ही धोखा करता हूं।
हां! मैं तेरी परवाह करता हूं।

अकेले ही हर स्पेशल डे सेलिब्रेट करता हूं।
तुम्हारी कमी महसूस करता हूं।
दोस्त कहते हैं इतना बोर क्यू करता हूं ,
सबसे खता होकर ,ऐसे ही इंजॉय करता हूं।
हां !मैं तेरी परवाह करता हूं।

चाहे मैं अजीब हरकतें करता हूं,
तुम्हें काफी परेशान करता हूं,
तुमसे मिलने के बहाने करता हूं,
समाज से डरता और नहीं भी डरता हूं।
हां! मैं तेरी परवाह करता हूं।

तुम्हारा नाम लेने से डरता हूं,
सबसे झूठ कहता हूं,
की मैं तुम्हें याद नहीं करता हूं।
लेकिन मैं तुम्हें बहुत मिस करता हूं।
मिस करता हूं, मिस करता हूं, 
ऐसे ही कुछ लिखकर, मन हल्का करता हूं।
हां ! मैं तेरी परवाह करता हूं।
मैं तेरी परवाह करता हूं।

                      
आभार एवं रचना :  //   आर. पूनिया  //

Friday, May 29, 2020

गणितीय प्रेम पत्र

मेरा प्रेम है कुछ ऐसा
नवम वर्ष की रचना के वृत जैसा ।
सोच कर भी यह समझ ना आता
किधर से शुरुआत करू, जिधर तेरा वास्ता।

मेरा मापदंड शायद,  कुछ इस तरह है घट जाता
तेरे परिमाप समक्ष हमेशा छोटा ही पड़ जाता ।
मैं अपना व्यास चाहे जितना बढाता,
एक तू है,
जिसका क्षेत्रफल मुझमे कभी नहीं समाता ।

रचना विकट ऐसी हो तुम रेखा की,
ज्यमिति शायद ही परिभाषित कर पाता ।
मेरा मन भी ना जाने कैसे, सम्मोहित हो गया ,
तेरी कृति को मर्यादित करना चाहता ।

सहारा लाख लेकर, चर अचर राशियों का,
तेरे हर मौन प्रश्नो का मै उत्तर खंगालता ।
ना जाने किस प्रश्न की विकट श्रृंखला तुम,
समीकरण कभी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाता।

हर कोशिश करता हूं, तुझ जैसा कभी मैं हो पाता,
पर 
क्षणिक तुझसे पीछे, अशांत दशमलव मुझ में लग जाता।।
हर विघ्नों को लांग कर, जब तेरे करीब सा आता,
दूरी मिलन की, ना जाने कैसे माप वर्ग कर जाता ।

मेरे मन प्राण में बस ,एक प्रेम-प्रमेय तुम्हारा,
अटल सत्य की भांति मनोरम बसता ।
हर क्षण ,हर पल, अपनी चर्या में,
उसी प्रमोद सिद्धांत की सत्यता को तरसता।

मैं हर राशि हर कथनों हर सिद्धांतों की
राह पकड़ कर,
उत्तर में प्रेम प्राप्त करने को मरता जाता हूं।
एक ना जाने क्यों तू है हठधर्मी,
हल में सदैव, मैं उत्तर अपरिमेय ही पाता हूं ।

नेह प्रश्न बस एक तुम ही से,
क्या मैं हल इसका तुमसे पाऊंगा?
तुम बात करती हो असमता की,
क्या मैं तुम्हें कभी,
अपने समक्ष सर्वांगसम पाऊंगा?

बहुपद सा है तेरा रूप विस्तृत
हर चर मान का मैं राही,
प्रतीक्षा में हूं ,उस गणन अंक के
जब दोनों हो पूरक, तेरा पथ मेरी राशि।
जन्म जन्मांतर के आलेखी,
एक दूजे के अभिलाषी, एक दूजे के अभिलाषी।

।।अंजनी भार्गव भास्कर।।

Monday, May 18, 2020

इस तरफ था मै

इस तरफ था मै खड़ा
तू खड़ा उस ओर था

मैं जहां था रूका
मंजर वहां का झकझोर था

उस तरफ थी वादियां हंसी 
यहां तो बस सैलाब का ही शोर था 

खुश था तू दूर जाकर मुझसे
पर उन आंसुओं की वजह कोई और था।

इस तरफ था मैं खड़ा
तू खड़ा उस ओर था।

तुम तो थे आलम फिजा में
खिंजा का आलम यहां झंझोर था।

सर्द वादियों में भी तपन थी सिसकीयों कि
बिखरा हुआ दिल, मातम से सराबोर था।

छूट रहा था उसका और मेरा साथ
बहार ने ना जाने लिया कैसा मोड़ था ।

इश्क पाने को निकले थे  रोशनी से
पर आफताब कुर्बानियों में ही मगरूर था।

इबादत थी जिसकी नसीहत सभी को
मैंखाने में पड़ा आज वो बेहसूर था ।

किस तरफ था मैं खड़ा?
तकदीर ने लिया कैसा मोड़ था !  

इस तरफ था मै खड़ा
क्यो  तू खड़ा उस ओर था!

                                         ।।भास्कर।।

Friday, May 01, 2020

मैं मजदूर तुम्हारा

मैं मजदूर तुम्हारा

मैं मजदूर तुम्हारा मैं भी एक इंसान हूं 
जीता नहीं इच्छा से अपनी
माया का रंक महान हूं
सोता हूं अपनों के ख्वाबों की खातिर
पल-पल मरता शाप समान हूं
हूं मैं भी इसी मही का कंकड़
रखता शक्ति का थोड़ा कम अभिमान हूं।

मैं मजदूर तुम्हारा मैं भी एक इंसान हूं।।

नहीं चाहता, चाह तुम्हारे जैसी
बस मांगता थोड़ा सा सम्मान हूं।
माना अपनी तुच्छ वर्ण श्रृंखला
पर कुटुंब का अकेला भरतार समान हूं।
बस दे दो अपना तनिक सहारा
दुर्भाग्य से लौ की बुझी कालिख बेकाम हूं।
दाता तुम ही म्हारे
मैं अकिंचन, तुम मेरे प्रधान हो
मैं मजदूर तुम्हारा मैं भी एक इंसान हूं।।

Monday, April 27, 2020

इस जहां की नहीं तू

चाहती है नजर तेरे हर नजारे कैद कर लूं
कहकशा के हर सितारों की सैर कर लूं
इश्क है तू ,तू है खुदा की इबादत
आशिकी में तेरी चाहता हूं खुद को मशहूर कर लूं।।

नजरें तेरी तीर सी , दिल को चीर कर दे
अदाएं कातिलाना कत्ल को मजबूर कर दे
हुस्न तेरा है कयामत या खुदा का नूर है
इस जहां की नहीं तू उस जहां की हूर है ।।

गजल है तू मेरी तुम ही मेरा साज हो
तुम ही मेरे टुटे दिल की आवाज हो
तुम हो मेरा जुनून तुम ही मेरी प्यास हो
मेरे पहले पहले इश्क का एहसास हो।।

शम्मा उल्फत की बुझाए  बुझती नहीं
यादों के साए में ,तेरी सदाए चुभती रही
पास जितनी है तू दिल के,उतनी ही तो दूर है
इस जहां की नहीं तू, उस जहां की हूर है।।

ख्वाब है मेरा तु  टूटने से डरता हूं
हो सकती नहीं पर पाने की तामीर करता हूं
छुप नहीं सकती चमक तेरी इस दिल में कही
तू रब की तरासी , बेशकीमती कोहिनूर है।

हे खुदा का अक्स तुझ में
तू कयामत की शमशीर है।
नजमा है तू बंद है तू 
तू है इनायत,  रब की लिखावट तू बेनजीर है
हां मैं कहता हूं तुझे
इस जहां की नहीं तू  उस जहां की हूर है।।

                                             ।। अंजनी भास्कर।।

आई रानी बसंती आई

कलकल कलकल करती नदियां 
सनन सनन सन पुरवाई
झर झर झर झर गिरे है झरने
ठंडी ठंडी फिजा है आई।

कुकू कुकू कूके कोयलिया
घनघोर घटा घिर आई।
सर सर सर सर बहे बसंती 
मयूरा ने पंखे फैलाई

लहर लहर लहराई फसले
घनन घनन घन  बदरा छाए
सहम सहम कर बोले किशनवा
ठहर ठहर इंदर भाई
काट लूं मैं गेहूंआ दाना
खुल के ले फिर अल्हड़ अंगड़ाई।।

गुनगुन करता गाए भंवरा
चुन चुन करती चिड़िया आई
हरे-हरे पल्लव व मंजर
मधु सुगंध से धरती भर आई।

घून घून करते शैतान भ्रमर
मस्त मंद सुगंध फूलों की छाई
भन भन भन भन्नाते बर्रे
तितली शहद चुराने आई

मद्धम मद्धम महके महुआ
छन छन कर धूपा आई
लहर लहर लहराई सरसों
खेतों में हरियाली आई।

कोयल संग पपीहा गाऐ 
खालिहानो ने दौनी गाई
कमर कसे खेतों में गुजरी
अन्नपूर्णा घर ले आई

भरते भरते भरे भंडारा
नाच नाच बैसाखी गाई
रंग रंग से भरे हैं चेहरे
फगुआ की बहार है छाई

रीत रीत के परब त्यौहारे
रंग बिरंगे नाच नगाड़े
बिहू गिद्दा और भवाई
राधे रानी संग नाचे कन्हाई।

जीवन का खुश रंग दिखाई
धरती पावन मधुबन बनाई
मायूसी है दूर भगाई
भांत भांत की चुनरीया ओढ़े
आई रे आई
रानी बसंती आई।
आई रे आई
रानी बसंती आई।
                                            ।। भास्कर।।

Tuesday, April 21, 2020

रणभूमि

क्रंदन क्रंदन है जग में
व्याप्त भय का 
स्पंदन है रग रग में
जिधर देखो कौतूहल मचा है
लाशों का बस अंबार लगा है
त्राहि-त्राहि से नभ पटा है 
महामारी का प्रकोप मचा है।
इससे अधिक न सह पाऊंगा ।
और तनिक ना लिख पाऊंगा ।।

भय से छिपे हुए हैं घर में
विचरा करते थे जो
नगर नगर में ,
शोर शराबा था जो जग का,
शोक समाचारों से भरा पड़ा है ,कब का ।
मंदिर बंद मजारे बंद है,
अट्टालिकाओं के द्वारे बंद है ।
इससे अधिक न सह पाऊंगा।
और अधिक ना कह पाऊंगा ।।

आओ प्रण ले अपने मन में,
डटे पड़े हैं वीर जो रण में,
मृत्यु से जो लड़ते हर पल दाएं बाएं
कर्मभूमि धूमिल ना उनकी हो जाए।
साथ हमारा उनका होगा
अब हर घर से रण बिगुल बजेगा
लक्ष्मणरेखा रणभूमि अपनी
रण से तनिक न घबराऊंगा ।।
इससे तनिक न कर पाऊंगा , 
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा।
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा ।।

सोचा करे

मिल गया है मुझे ,
अब ख़ाक क्या सोचा करे ।
 
हल्की सी बारिश में ,
अब मन को क्यों फिका करे ।
 
क्यों करे चाहत जवाहर की ,
शीत में मोती
धारा पर यूं हीं बिखरा करे ।।

कोहरे की चादर में था जो 
अंगड़ाती धूप में 
अब क्यों सोचा करे ।।

इस गुलाबी सी उषा से 
काहिर मन- बदन को सींचा करे ।

मिल गया है मुझे "भास्कर"
ख़ाक सर्द से ठिठुरा करे ।।

Wednesday, April 15, 2020

रणभूमि


क्रंदन क्रंदन है जग में
व्याप्त भय का
स्पंदन है रग रग में
जिधर देखो कौतूहल मचा है
लाशों का बस अंबार लगा है
त्राहि-त्राहि से नभ पटा है
महामारी का प्रकोप मचा है।
इससे अधिक न सह पाऊंगा ।
और तनिक ना लिख पाऊंगा ।।

भय से छिपे हुए हैं घर में
विचरा करते थे जो
नगर नगर में ,
शोर शराबा था जो जग का,
शोक समाचारों से भरा पड़ा है ,कब का ।
मंदिर बंद मजारे बंद है,
अट्टालिकाओं के द्वारे बंद है ।
हृदय विदारण ना सह पाऊंगा।
और अधिक ना कह पाऊंगा ।।

आओ प्रण ले अपने मन में,
डटे पड़े हैं वीर जो रण में,
मृत्यु से जो लड़ते हर पल दाएं बाएं
कर्मभूमि धूमिल ना उनकी हो जाए।
साथ हमारा उनका होगा
अब हर घर से रण बिगुल बजेगा
लक्ष्मणरेखा रणभूमि अपनी
रण से तनिक न घबराऊंगा ।।
इससे तनिक न कर पाऊंगा ,
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा।
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा ।।

 ।। अंजनी भार्गव भास्कर ।।

Saturday, April 11, 2020

जल रहा मेरा शहर है।

किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है
क्यों यह फैली है उदासी
कैसा ये विस्मय में प्रहर है ।
कैसी है फैली बदहवासी
ना जाने आने वाले
किस जलजले का ये डर है।।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।
दिख रहा ना कोई आंखों मे
क्यों दुबके हुए चारों प्रहर हैं।
सूने सूने पड़े हैं रास्ते
फैला विष हवा में
लग रहा मातम का शिविर है।।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।

डर का ये कैसा भवर है
खौफ का हर तरफ क्यों
पसरा हुआ मंजर है ।
धुंध काली है बदी में 
दिख रहा ना रह गुजर है।
मौन में है क्यों खड़ी
रोती हुई क्यों शब सहर है
थी अभी जो शाह सी
आज विधवा बेसंंवर है।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।

बेसुधी है जहां में
खा रही बरबादियां है।
बंद पड़े  हैं घरों में दर सभी ।
मर रही उनकी सिसकारियां है।
लूटे जा रहे है क्यो
जो सहमे से है , बे-घर बे-शहर  हैं।
पड रही है कम कबरे,
दे रहा कोई नहीं क्यों खबर है।
ये किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।

Sunday, January 26, 2020

रंग तिरंगा

रंग तिरंगा 

शान हमारी
केसरिया है 
केसरिया है  रंग बाहु का ,
तन  में दौड़े जो ,
वो केसरिया है |
बलिदानों की गाथा है,
रंजित है गुणगानो से ,
आन हमारी केसरिया है ||

बाजू है प्रगाढ़ बली
पर ,
हमारा श्वेत इरादा है |
जन मानस में दे संदेशा
प्रेम हमारी परिभाषा है |
सत्य विजयी , सर्वत्र विजयी ,
जन जन में व्याप्त
यही इरादा है ||

खलिहानो की हरी सम्पदा
जय है हमारी हरियाली  |
हरा रंग है बसता भू  पर ,
है देश की खुशहाली |
यही तीन है रंग हमारा
शान्तिप्रिय ,आमोदी व बलवाई
रुह  हमारी यही तिरंगा ,
ऐसे ही हम भारतवासी | |   


                                                                                                                             ||  भास्कर ||

Monday, January 13, 2020

इंडियन मजा

मजा बहुत है , मजा बहुत है | 
खैरात  के खाने का ,
सलाद में , 
प्याज़ मिल जाने का ,
बेतुका तीर लग जाने का ,
मजा बहुत है | 
बेमांगी देने में राय ,
मुफ्त में मिली चाय , 
ठण्ड की अलाव  में 
जगह  मिल जाने का ,
मजा बहुत है मजा बहुत है || 
शादी के पहनावे का , 
मैडम के मइके जाने का,
जून की रसमलाई का 
ठण्ड की रजाई का 
मजा बहुत है मजा बहुत है || 
सर्दी की चाय का , 
पडोसी की लड़ाई का ,
नींद वाली जम्हाई का 
कम्बल की गरमाई का 
मजा बहुत है मजा बहुत है || 
दो दिन से नहाने का 
ऑफिस न जाने का 
फ्री की शोहरत पाने का 
नये नये  बहाने का 
मजा बहुत है मजा बहुत है || 
 टूर के प्लान का
रिजर्वेशन टिकट की लाइन का 
वेटिंग की बर्थ असाइन का 
कैशबैक की कमाई का 
गर्ल-फ्रेंड के साथ घुमाई का 
मजा बहुत है मजा बहुत है || 

फंटूस  poem गाने का 
बैसाख के राजाओ को सुनाने का 
खुद पे  इतराने का
आपका टाइम पास करने का 
थोड़ा ovation मिल जाने का 
मजा बहुत है मजा बहुत है || मजा बहुत है मजा बहुत है || 

                                                                              || भास्कर ||