क्रंदन क्रंदन है जग में
व्याप्त भय का
स्पंदन है रग रग में
जिधर देखो कौतूहल मचा है
लाशों का बस अंबार लगा है
त्राहि-त्राहि से नभ पटा है
महामारी का प्रकोप मचा है।
इससे अधिक न सह पाऊंगा ।
और तनिक ना लिख पाऊंगा ।।
भय से छिपे हुए हैं घर में
विचरा करते थे जो
नगर नगर में ,
शोर शराबा था जो जग का,
शोक समाचारों से भरा पड़ा है ,कब का ।
मंदिर बंद मजारे बंद है,
अट्टालिकाओं के द्वारे बंद है ।
हृदय विदारण ना सह पाऊंगा।
और अधिक ना कह पाऊंगा ।।
आओ प्रण ले अपने मन में,
डटे पड़े हैं वीर जो रण में,
मृत्यु से जो लड़ते हर पल दाएं बाएं
कर्मभूमि धूमिल ना उनकी हो जाए।
साथ हमारा उनका होगा
अब हर घर से रण बिगुल बजेगा
लक्ष्मणरेखा रणभूमि अपनी
रण से तनिक न घबराऊंगा ।।
इससे तनिक न कर पाऊंगा ,
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा।
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा ।।
।। अंजनी भार्गव भास्कर ।।
No comments:
Post a Comment