इस तरफ था मै खड़ा
तू खड़ा उस ओर था
मैं जहां था रूका
मंजर वहां का झकझोर था
उस तरफ थी वादियां हंसी
यहां तो बस सैलाब का ही शोर था
खुश था तू दूर जाकर मुझसे
पर उन आंसुओं की वजह कोई और था।
इस तरफ था मैं खड़ा
तू खड़ा उस ओर था।
तुम तो थे आलम फिजा में
खिंजा का आलम यहां झंझोर था।
सर्द वादियों में भी तपन थी सिसकीयों कि
बिखरा हुआ दिल, मातम से सराबोर था।
छूट रहा था उसका और मेरा साथ
बहार ने ना जाने लिया कैसा मोड़ था ।
इश्क पाने को निकले थे रोशनी से
पर आफताब कुर्बानियों में ही मगरूर था।
इबादत थी जिसकी नसीहत सभी को
मैंखाने में पड़ा आज वो बेहसूर था ।
किस तरफ था मैं खड़ा?
तकदीर ने लिया कैसा मोड़ था !
इस तरफ था मै खड़ा
क्यो तू खड़ा उस ओर था!
।।भास्कर।।
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