किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है
क्यों यह फैली है उदासी
कैसा ये विस्मय में प्रहर है ।
कैसी है फैली बदहवासी
ना जाने आने वाले
किस जलजले का ये डर है।।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।
दिख रहा ना कोई आंखों मे
क्यों दुबके हुए चारों प्रहर हैं।
सूने सूने पड़े हैं रास्ते
फैला विष हवा में
लग रहा मातम का शिविर है।।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।
डर का ये कैसा भवर है
खौफ का हर तरफ क्यों
पसरा हुआ मंजर है ।
धुंध काली है बदी में
दिख रहा ना रह गुजर है।
मौन में है क्यों खड़ी
रोती हुई क्यों शब सहर है
थी अभी जो शाह सी
आज विधवा बेसंंवर है।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।
बेसुधी है जहां में
खा रही बरबादियां है।
बंद पड़े हैं घरों में दर सभी ।
मर रही उनकी सिसकारियां है।
लूटे जा रहे है क्यो
जो सहमे से है , बे-घर बे-शहर हैं।
पड रही है कम कबरे,
दे रहा कोई नहीं क्यों खबर है।
ये किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।
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