विरहन
जो अगर शब्दो के जाल
बुन पाती ,
बातो की गाठे बांध
कर,
हंसीन ख्वाबो की
दुनिया मे,
जहा भावो कि तार के
सरगम तले
सोचा जो कभी , ले जाने को तुम्हे ,
पा लेने का जाल
बनाती ॥
जो अगर शब्दो के जाल
बुन पाती......!!
जो नज़रो के तीर चला
पाती,
तेरे मिची-मीची नज़रो
के ढाल तोड्ने की खातिर ,
तिरछी नैनो के कटार
चलाती।
प्रेम बाण चला कर
तेरे कठूह हृद्य को
छ्ल जाती।
लहु हृद्य से जो बहा
सके ,
वैसा अस्त्र बना पाती।
वर्षा कर देती फिर तुझ
पर जो अगर नज़रो के तीर चला पाती॥
जिस बहाव मे तु बह सके
,
वो धार कहा से मै लाऊ
?
जो अगर मै बुंदे होती
,
तेरे तन- मन पे मै गिर
जाती,
ना रिमझिम तो फिर ,
बहती बहती तुझमे मिल
जाती।
जो मै ना अभी बंधी होती
लज्जा से ,
तो तुझसे शायद मै वो
सब कह पाती....
ना ताल , ना बर्षा , मै धारा सी बह आती ॥
प्रेम के समुंदर मे मै
,
फिर तुझसे घुल- मिल जाती
॥
काश ! तुमको मै ये समझा
पाती !!!