जिंदगी क्या है ?
समय का भावनाओ के साथ बहाव और उस बहाव में डूबते-उबरते समय को पार करना ही जिंदगी है . !
Friday, April 20, 2012
Wednesday, April 18, 2012
एक कली डाल से टूट गई
डाल झंझोड़ी इस तरह
काल हवा ने फिर ,
फिर एक कली डाल से टूट गई ।
हसरते खिलने की ,
महकने की , फलने की ,
आज फिर डाल से रूठ गई ।
सोचती तरू
खिलती मेरी भी सुन्दरता ,
मै भी बनती फिर संपन्न-सुवर्णा ,
पर आई ऐसी आंधी ,
अरमानो को बिंध गई ।
आज फिर एक कली ,
डाल से छुट गई ।
कली तो कुछ ना कह सकी
लेकिन जाते देख उसे ,
डाल ना आंखे मींच सकी।
तड़पती ,तरसती , सिसकिया लेती
बंधी भूमि पर जड़ो से ,
चाह कर भी ना बाजु पसेरती ।
बार बार काल के प्रहार से,
कठुह हृदय वो बन चली ।
फिर अगला मौसम आएगा ,
अगले बहार के इंतजार में ,
तरु फिर से पलकों को सींच गई ।
आज फिर एक कली डाल से टूट गई ।
काल हवा ने फिर ,
फिर एक कली डाल से टूट गई ।
हसरते खिलने की ,
महकने की , फलने की ,
आज फिर डाल से रूठ गई ।
सोचती तरू
खिलती मेरी भी सुन्दरता ,
मै भी बनती फिर संपन्न-सुवर्णा ,
पर आई ऐसी आंधी ,
अरमानो को बिंध गई ।
आज फिर एक कली ,
डाल से छुट गई ।
कली तो कुछ ना कह सकी
लेकिन जाते देख उसे ,
डाल ना आंखे मींच सकी।
तड़पती ,तरसती , सिसकिया लेती
बंधी भूमि पर जड़ो से ,
चाह कर भी ना बाजु पसेरती ।
बार बार काल के प्रहार से,
कठुह हृदय वो बन चली ।
फिर अगला मौसम आएगा ,
अगले बहार के इंतजार में ,
तरु फिर से पलकों को सींच गई ।
आज फिर एक कली डाल से टूट गई ।
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