मेरा प्रेम है कुछ ऐसा
नवम वर्ष की रचना के वृत जैसा ।
सोच कर भी यह समझ ना आता
किधर से शुरुआत करू, जिधर तेरा वास्ता।
मेरा मापदंड शायद, कुछ इस तरह है घट जाता
तेरे परिमाप समक्ष हमेशा छोटा ही पड़ जाता ।
मैं अपना व्यास चाहे जितना बढाता,
एक तू है,
जिसका क्षेत्रफल मुझमे कभी नहीं समाता ।
रचना विकट ऐसी हो तुम रेखा की,
ज्यमिति शायद ही परिभाषित कर पाता ।
मेरा मन भी ना जाने कैसे, सम्मोहित हो गया ,
तेरी कृति को मर्यादित करना चाहता ।
सहारा लाख लेकर, चर अचर राशियों का,
तेरे हर मौन प्रश्नो का मै उत्तर खंगालता ।
ना जाने किस प्रश्न की विकट श्रृंखला तुम,
समीकरण कभी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाता।
हर कोशिश करता हूं, तुझ जैसा कभी मैं हो पाता,
पर
क्षणिक तुझसे पीछे, अशांत दशमलव मुझ में लग जाता।।
हर विघ्नों को लांग कर, जब तेरे करीब सा आता,
दूरी मिलन की, ना जाने कैसे माप वर्ग कर जाता ।
मेरे मन प्राण में बस ,एक प्रेम-प्रमेय तुम्हारा,
अटल सत्य की भांति मनोरम बसता ।
हर क्षण ,हर पल, अपनी चर्या में,
उसी प्रमोद सिद्धांत की सत्यता को तरसता।
मैं हर राशि हर कथनों हर सिद्धांतों की
राह पकड़ कर,
उत्तर में प्रेम प्राप्त करने को मरता जाता हूं।
एक ना जाने क्यों तू है हठधर्मी,
हल में सदैव, मैं उत्तर अपरिमेय ही पाता हूं ।
नेह प्रश्न बस एक तुम ही से,
क्या मैं हल इसका तुमसे पाऊंगा?
तुम बात करती हो असमता की,
क्या मैं तुम्हें कभी,
अपने समक्ष सर्वांगसम पाऊंगा?
बहुपद सा है तेरा रूप विस्तृत
हर चर मान का मैं राही,
प्रतीक्षा में हूं ,उस गणन अंक के
जब दोनों हो पूरक, तेरा पथ मेरी राशि।
जन्म जन्मांतर के आलेखी,
एक दूजे के अभिलाषी, एक दूजे के अभिलाषी।
।।अंजनी भार्गव भास्कर।।
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