Lovely world

Monday, July 13, 2020

हम तुम

एक सवाल है तुमसे
हरदम कहता है यूं
क्या तुम ,तुम ही हो
या फिर मैं भी हूं तुझमें
क्या तुम ही हो
या फिर मात्र चेतना
जो भी हो शायद
पर वो हो जो
हर पल मेरा था और मैं उसका....

क्यों है घना अंधेरा
क्या वो तुम ही हो जो
जल रहे हो मद्धम मद्धम
या फिर मैं भी हूं उसमें
जो पल पल मिट रहा है हरदम
वह जो उठ रही चमक
क्या वह दीपक तुम ही हो या,
मैं भी हूं तुममे
वह बाती जलती सी
जिसकी वजह से हो तुम

क्यों विपिन है भीगा भीगा
बिखरे हो क्या यहां
चमक उषा हो या कण शीता की
या तुम मोती वसुंधरा की
क्या तुम ही हो केवल "रत्ने"
या फिर मैं भी हूं
जिस से लिपट कर
तुम माणिक सजे

क्या फिर से तुम
तुम ही रहोगे
या कभी कहोगे
मैं ,मैं नहीं तुम ,तुम नहीं
बस केवल हम तुम।

Tuesday, June 02, 2020

कुछ तो लिखो


क्या लिखूं
कहते हो कुछ तो लिखो मुझ पर
क्या कहूं
तुम ही मेरी कविता हो
शायद देता तुम्हें कोई उपमा
पर
 मेरे लिए तुम अनुपमा हो ।
 क्या लिखूं कहते हो कुछ तो लिखो ।।

मैं तो बस एक पतवार
पर तुम ही मेरी मझधार हो,
मैं जो अब तक था
नीःरस
तुम ही तो मेरा श्रृंगार हो।।
करता तुम्हारी तुलना 
किसी मूरत से,
पर तुम तो जीवन रस का भंडार हो।
क्या लिखूं तेरे लिए
तुम तो मेरे जीवन का आधार हो ।।

Monday, June 01, 2020

दादा टीबी और रेडियो

दादा बैठे हैं दरवज्जे पर
पोते पोते खेल रहे अंगना
दो चाचा बूनते हैं खटिया 
बाबा खेतन में जोते जुहा।

बड़की चाची लाई जो है रेडियो
पिछले साल मुकलाने में,
दादा चाचा लड़ते हैं अक्सर,
रखने उनको अपने सिरहाने में।

बाबा को फुर्सत नहीं है,
दौनी खेत जुहाने से
अम्मा सोचे कब छुट्टी मिले
चूल्हा चौका औ काम घराने से।

एक दिन पूछा दादा ने
बबुआ ।यह टीवी क्या होता है? ,
क्यों कहता है बार बार रेडियो में,
टीवी से घर  सजाता है।
कहते हैं दिखती इसमें है
चलती फिरती चित्र सदा ।
चिड़िया बगिया मे उड़ती 
नदिया बहती इसमें साक्षात यहां ।

मन मेरा कहता है बेटा
एक बार टीबी दिखलाने को।
अगर मिले कहीं तुझको टीबी
ले चल मुझे दिखाने को।

छोटा कहता है, हां बापू मैंने भी देखा है उसको
शहर की बड़ी दुकानों पे।
लगता बड़ा सुंदर है मनोरम
आवाज मधुर है कानो में।

इस बार अगर बरखा हो अच्छी
अच्छे दाम मिलेंगे आनो में।
जब जमा हो दो चार पैसे 
खरीद लाएंगे टीवी
मिलकर देखेंगे सब टीवी मुस्कानों से।

सुन दादा का रोम-रोम रोमांचित हो जाता
इस बार फसल के लहलहाने की
मन में एक स्मृति सजाता।
हर रोज ले हाल बाबा से खेती का
हर रोज सपनों में खो जाता।
ऐसा लगता ज्यो जान बसती हो
इस विकट सपने को पाने को।
अहा। इस बार बारिश का रुख कुछ है अलग
लगे खेत लहराने को।
खेतों में गेहूं है मचले
टूट टूट कर अन्न बन जाने को।

बाबा लेटे-लेटे देखे आंखों से सपना,
घर भरा हो अन्न धन धान से ।
चाचा दादा स्वप्न सजाए,
टीवी के बड़े अरमान से।

एक शाम सहसा रेडियो
कानों में दादा के बोला।
तू तो है संगी मेरा
पर उस बेरहमी टीवी की खातिर,
क्यों मुझसे है नाता तोड़ रहा।
तुझे नहीं पता,
वह मुझ जैसा, तेरा साथ नहीं निभाएगा
वह तेरे हाथों में मुझ जैसे
घर से खेतों में, खेतों से पनघट तक नहीं जाएगा।
मांगेगा तुझसे दाना पानी,
 बिजली भी बहुत खाएगा।
मैं तो हूं तेरा सच्चा साथी
अगर मर जाएगी मेरी बैटरी
फिर भी मरता मरता मीठे स्वर सुनाऊंगा।
दादा बोला सुन रेडियो क्यों ऐसे भरमाता है।
टीवी तेरा भैया ,आएगा तो ऐसे क्यों घबराता है?

बोला रेडियो, मेरा मान तुम सब के बीच फिर घट जाएगा
मीठे मीठे मधुर संगीत सुनने पास न मेरे कोई आएगा
मैं हो जाऊंगा अकेला कोई मुझे ना चाहेगा
जो अकेला पड़ जाऊंगा जीते जी मर जाऊंगा।
सुन रेडियो की दशा, दादा मन में उकसाते हैं
अंतर्मन की उसकी व्यथा से थोड़ा सा घबराते हैं।

पर चाहत है अति प्रबल, चलचित्र देखने की
जो तुम पूरी ना कर पाओगे।
तुम मुझे वह रोमांच भला, बताओ कैसे दे पाओगे?
क्या तुम मेरी दशा बताओ दूर कर पाओगे?
रेडियो सुन थोड़ा सा आहत हुआ
चुप होकर 
सहमा कर मौन तकिए के कोने में जा पड़ा।

क्रोध अग्नि  में वह अंदर ही अंदर जलता जाता है।
अनिष्ट ना करना चाहते हुए भी अनिष्ट कर जाता है।
जब दादा चालू करते रेडियो,
तमस खाकर वह भविष्यवाणी कर जाता है।
रात होगी अतिवृष्टी तेरे खेतों में 
जा देख अब तू क्या कर पाता है?
जा बचाने फसल अपनी, 
क्यों सपनों में क्षण गवाता है ।

ज्यो ही सुना दादा बाबा चाचा ने
रातों में ही खेतों में दौड़ पड़े।
लगे जल्दी-जल्दी खेतों में अपनी
हसुआ से गेहूं के पके हुए सब तान काटे।
पर शाप रेडियो का ना विफल हुआ
तभी अचानक आंधी बरसा लगे बरसने
किया तबाही का ऐसा मंजर
आधे फसलों का ना फल हुआ।
ना हुआ मुनाफा, लागत ही मुश्किल से फला।
बाबा के जो बड़े-बड़े थे सपने,
अंबर से फिर मही पर ही आ मिला।

पर दादा मौन पड़े चुपचाप दलानी में
कुछ बोल नहीं पाते हैं।
टूटते देख सपना चलचित्र टीवी  का,
कुछ बेसुध से हो जाते हैं।
पर पीड़ा अपने मन की, हलाहल की तरह पी जाते हैं।

कानों में,
बजता मधुर संगीत सरगम 
 कोने में, छुपा रेडियो जब उठाते हैं।
छोड़ सपना टीवी का, वो संगीत में रम जाते हैं।
थोड़ा गम हल्का होता है, फिर थोड़ा मुस्काते हैं।
इसी तरह फिर से 
बाबा चाचा दादा सब रेडियो के संग ही मिल जाते हैं।
सब रेडियो के संग ही मिल जाते हैं।


                      ।। भास्कर।।

Saturday, May 30, 2020

मैं तेरी परवाह करता हूं

अभी लेटा था बस  मैं,
सोचा तुम्हें मैसेज करता हूं,
पुराने दिन याद आ गए जिनमें
तुम से ढेर सारी बात करता हूं।
हां ! मैं तेरी परवाह करता हूं।।

तुमसे मिलने के लिए,
याद वो कॉलेज के बंक करता हूं।
फिर तुम्हारे साथ
याद वह लंच करता हूं।
सपना टूटने से डरता हूं,
पता नहीं ये सब क्यू करता हूं?
हां ! मैं तेरी परवाह करता हूं ।

रात भर जगता हूं
अक्सर टेरिस पर फिरता हूं ‌
चांद को तकता हूं,
अपने चांद को मिस करता हूं।
हां ! मैं तेरी परवाह करता हूं।

तुमसे बात करने को बेताब रहता हूं।
मन मेरा भी नहीं करता खुद को रोकने का,
फिर भी खुद को रोका करता हूं,
‌लगता है खुद से ही धोखा करता हूं।
हां! मैं तेरी परवाह करता हूं।

अकेले ही हर स्पेशल डे सेलिब्रेट करता हूं।
तुम्हारी कमी महसूस करता हूं।
दोस्त कहते हैं इतना बोर क्यू करता हूं ,
सबसे खता होकर ,ऐसे ही इंजॉय करता हूं।
हां !मैं तेरी परवाह करता हूं।

चाहे मैं अजीब हरकतें करता हूं,
तुम्हें काफी परेशान करता हूं,
तुमसे मिलने के बहाने करता हूं,
समाज से डरता और नहीं भी डरता हूं।
हां! मैं तेरी परवाह करता हूं।

तुम्हारा नाम लेने से डरता हूं,
सबसे झूठ कहता हूं,
की मैं तुम्हें याद नहीं करता हूं।
लेकिन मैं तुम्हें बहुत मिस करता हूं।
मिस करता हूं, मिस करता हूं, 
ऐसे ही कुछ लिखकर, मन हल्का करता हूं।
हां ! मैं तेरी परवाह करता हूं।
मैं तेरी परवाह करता हूं।

                      
आभार एवं रचना :  //   आर. पूनिया  //

Friday, May 29, 2020

गणितीय प्रेम पत्र

मेरा प्रेम है कुछ ऐसा
नवम वर्ष की रचना के वृत जैसा ।
सोच कर भी यह समझ ना आता
किधर से शुरुआत करू, जिधर तेरा वास्ता।

मेरा मापदंड शायद,  कुछ इस तरह है घट जाता
तेरे परिमाप समक्ष हमेशा छोटा ही पड़ जाता ।
मैं अपना व्यास चाहे जितना बढाता,
एक तू है,
जिसका क्षेत्रफल मुझमे कभी नहीं समाता ।

रचना विकट ऐसी हो तुम रेखा की,
ज्यमिति शायद ही परिभाषित कर पाता ।
मेरा मन भी ना जाने कैसे, सम्मोहित हो गया ,
तेरी कृति को मर्यादित करना चाहता ।

सहारा लाख लेकर, चर अचर राशियों का,
तेरे हर मौन प्रश्नो का मै उत्तर खंगालता ।
ना जाने किस प्रश्न की विकट श्रृंखला तुम,
समीकरण कभी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाता।

हर कोशिश करता हूं, तुझ जैसा कभी मैं हो पाता,
पर 
क्षणिक तुझसे पीछे, अशांत दशमलव मुझ में लग जाता।।
हर विघ्नों को लांग कर, जब तेरे करीब सा आता,
दूरी मिलन की, ना जाने कैसे माप वर्ग कर जाता ।

मेरे मन प्राण में बस ,एक प्रेम-प्रमेय तुम्हारा,
अटल सत्य की भांति मनोरम बसता ।
हर क्षण ,हर पल, अपनी चर्या में,
उसी प्रमोद सिद्धांत की सत्यता को तरसता।

मैं हर राशि हर कथनों हर सिद्धांतों की
राह पकड़ कर,
उत्तर में प्रेम प्राप्त करने को मरता जाता हूं।
एक ना जाने क्यों तू है हठधर्मी,
हल में सदैव, मैं उत्तर अपरिमेय ही पाता हूं ।

नेह प्रश्न बस एक तुम ही से,
क्या मैं हल इसका तुमसे पाऊंगा?
तुम बात करती हो असमता की,
क्या मैं तुम्हें कभी,
अपने समक्ष सर्वांगसम पाऊंगा?

बहुपद सा है तेरा रूप विस्तृत
हर चर मान का मैं राही,
प्रतीक्षा में हूं ,उस गणन अंक के
जब दोनों हो पूरक, तेरा पथ मेरी राशि।
जन्म जन्मांतर के आलेखी,
एक दूजे के अभिलाषी, एक दूजे के अभिलाषी।

।।अंजनी भार्गव भास्कर।।