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Monday, June 01, 2020

दादा टीबी और रेडियो

दादा बैठे हैं दरवज्जे पर
पोते पोते खेल रहे अंगना
दो चाचा बूनते हैं खटिया 
बाबा खेतन में जोते जुहा।

बड़की चाची लाई जो है रेडियो
पिछले साल मुकलाने में,
दादा चाचा लड़ते हैं अक्सर,
रखने उनको अपने सिरहाने में।

बाबा को फुर्सत नहीं है,
दौनी खेत जुहाने से
अम्मा सोचे कब छुट्टी मिले
चूल्हा चौका औ काम घराने से।

एक दिन पूछा दादा ने
बबुआ ।यह टीवी क्या होता है? ,
क्यों कहता है बार बार रेडियो में,
टीवी से घर  सजाता है।
कहते हैं दिखती इसमें है
चलती फिरती चित्र सदा ।
चिड़िया बगिया मे उड़ती 
नदिया बहती इसमें साक्षात यहां ।

मन मेरा कहता है बेटा
एक बार टीबी दिखलाने को।
अगर मिले कहीं तुझको टीबी
ले चल मुझे दिखाने को।

छोटा कहता है, हां बापू मैंने भी देखा है उसको
शहर की बड़ी दुकानों पे।
लगता बड़ा सुंदर है मनोरम
आवाज मधुर है कानो में।

इस बार अगर बरखा हो अच्छी
अच्छे दाम मिलेंगे आनो में।
जब जमा हो दो चार पैसे 
खरीद लाएंगे टीवी
मिलकर देखेंगे सब टीवी मुस्कानों से।

सुन दादा का रोम-रोम रोमांचित हो जाता
इस बार फसल के लहलहाने की
मन में एक स्मृति सजाता।
हर रोज ले हाल बाबा से खेती का
हर रोज सपनों में खो जाता।
ऐसा लगता ज्यो जान बसती हो
इस विकट सपने को पाने को।
अहा। इस बार बारिश का रुख कुछ है अलग
लगे खेत लहराने को।
खेतों में गेहूं है मचले
टूट टूट कर अन्न बन जाने को।

बाबा लेटे-लेटे देखे आंखों से सपना,
घर भरा हो अन्न धन धान से ।
चाचा दादा स्वप्न सजाए,
टीवी के बड़े अरमान से।

एक शाम सहसा रेडियो
कानों में दादा के बोला।
तू तो है संगी मेरा
पर उस बेरहमी टीवी की खातिर,
क्यों मुझसे है नाता तोड़ रहा।
तुझे नहीं पता,
वह मुझ जैसा, तेरा साथ नहीं निभाएगा
वह तेरे हाथों में मुझ जैसे
घर से खेतों में, खेतों से पनघट तक नहीं जाएगा।
मांगेगा तुझसे दाना पानी,
 बिजली भी बहुत खाएगा।
मैं तो हूं तेरा सच्चा साथी
अगर मर जाएगी मेरी बैटरी
फिर भी मरता मरता मीठे स्वर सुनाऊंगा।
दादा बोला सुन रेडियो क्यों ऐसे भरमाता है।
टीवी तेरा भैया ,आएगा तो ऐसे क्यों घबराता है?

बोला रेडियो, मेरा मान तुम सब के बीच फिर घट जाएगा
मीठे मीठे मधुर संगीत सुनने पास न मेरे कोई आएगा
मैं हो जाऊंगा अकेला कोई मुझे ना चाहेगा
जो अकेला पड़ जाऊंगा जीते जी मर जाऊंगा।
सुन रेडियो की दशा, दादा मन में उकसाते हैं
अंतर्मन की उसकी व्यथा से थोड़ा सा घबराते हैं।

पर चाहत है अति प्रबल, चलचित्र देखने की
जो तुम पूरी ना कर पाओगे।
तुम मुझे वह रोमांच भला, बताओ कैसे दे पाओगे?
क्या तुम मेरी दशा बताओ दूर कर पाओगे?
रेडियो सुन थोड़ा सा आहत हुआ
चुप होकर 
सहमा कर मौन तकिए के कोने में जा पड़ा।

क्रोध अग्नि  में वह अंदर ही अंदर जलता जाता है।
अनिष्ट ना करना चाहते हुए भी अनिष्ट कर जाता है।
जब दादा चालू करते रेडियो,
तमस खाकर वह भविष्यवाणी कर जाता है।
रात होगी अतिवृष्टी तेरे खेतों में 
जा देख अब तू क्या कर पाता है?
जा बचाने फसल अपनी, 
क्यों सपनों में क्षण गवाता है ।

ज्यो ही सुना दादा बाबा चाचा ने
रातों में ही खेतों में दौड़ पड़े।
लगे जल्दी-जल्दी खेतों में अपनी
हसुआ से गेहूं के पके हुए सब तान काटे।
पर शाप रेडियो का ना विफल हुआ
तभी अचानक आंधी बरसा लगे बरसने
किया तबाही का ऐसा मंजर
आधे फसलों का ना फल हुआ।
ना हुआ मुनाफा, लागत ही मुश्किल से फला।
बाबा के जो बड़े-बड़े थे सपने,
अंबर से फिर मही पर ही आ मिला।

पर दादा मौन पड़े चुपचाप दलानी में
कुछ बोल नहीं पाते हैं।
टूटते देख सपना चलचित्र टीवी  का,
कुछ बेसुध से हो जाते हैं।
पर पीड़ा अपने मन की, हलाहल की तरह पी जाते हैं।

कानों में,
बजता मधुर संगीत सरगम 
 कोने में, छुपा रेडियो जब उठाते हैं।
छोड़ सपना टीवी का, वो संगीत में रम जाते हैं।
थोड़ा गम हल्का होता है, फिर थोड़ा मुस्काते हैं।
इसी तरह फिर से 
बाबा चाचा दादा सब रेडियो के संग ही मिल जाते हैं।
सब रेडियो के संग ही मिल जाते हैं।


                      ।। भास्कर।।

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