Lovely world

Monday, April 27, 2020

इस जहां की नहीं तू

चाहती है नजर तेरे हर नजारे कैद कर लूं
कहकशा के हर सितारों की सैर कर लूं
इश्क है तू ,तू है खुदा की इबादत
आशिकी में तेरी चाहता हूं खुद को मशहूर कर लूं।।

नजरें तेरी तीर सी , दिल को चीर कर दे
अदाएं कातिलाना कत्ल को मजबूर कर दे
हुस्न तेरा है कयामत या खुदा का नूर है
इस जहां की नहीं तू उस जहां की हूर है ।।

गजल है तू मेरी तुम ही मेरा साज हो
तुम ही मेरे टुटे दिल की आवाज हो
तुम हो मेरा जुनून तुम ही मेरी प्यास हो
मेरे पहले पहले इश्क का एहसास हो।।

शम्मा उल्फत की बुझाए  बुझती नहीं
यादों के साए में ,तेरी सदाए चुभती रही
पास जितनी है तू दिल के,उतनी ही तो दूर है
इस जहां की नहीं तू, उस जहां की हूर है।।

ख्वाब है मेरा तु  टूटने से डरता हूं
हो सकती नहीं पर पाने की तामीर करता हूं
छुप नहीं सकती चमक तेरी इस दिल में कही
तू रब की तरासी , बेशकीमती कोहिनूर है।

हे खुदा का अक्स तुझ में
तू कयामत की शमशीर है।
नजमा है तू बंद है तू 
तू है इनायत,  रब की लिखावट तू बेनजीर है
हां मैं कहता हूं तुझे
इस जहां की नहीं तू  उस जहां की हूर है।।

                                             ।। अंजनी भास्कर।।

आई रानी बसंती आई

कलकल कलकल करती नदियां 
सनन सनन सन पुरवाई
झर झर झर झर गिरे है झरने
ठंडी ठंडी फिजा है आई।

कुकू कुकू कूके कोयलिया
घनघोर घटा घिर आई।
सर सर सर सर बहे बसंती 
मयूरा ने पंखे फैलाई

लहर लहर लहराई फसले
घनन घनन घन  बदरा छाए
सहम सहम कर बोले किशनवा
ठहर ठहर इंदर भाई
काट लूं मैं गेहूंआ दाना
खुल के ले फिर अल्हड़ अंगड़ाई।।

गुनगुन करता गाए भंवरा
चुन चुन करती चिड़िया आई
हरे-हरे पल्लव व मंजर
मधु सुगंध से धरती भर आई।

घून घून करते शैतान भ्रमर
मस्त मंद सुगंध फूलों की छाई
भन भन भन भन्नाते बर्रे
तितली शहद चुराने आई

मद्धम मद्धम महके महुआ
छन छन कर धूपा आई
लहर लहर लहराई सरसों
खेतों में हरियाली आई।

कोयल संग पपीहा गाऐ 
खालिहानो ने दौनी गाई
कमर कसे खेतों में गुजरी
अन्नपूर्णा घर ले आई

भरते भरते भरे भंडारा
नाच नाच बैसाखी गाई
रंग रंग से भरे हैं चेहरे
फगुआ की बहार है छाई

रीत रीत के परब त्यौहारे
रंग बिरंगे नाच नगाड़े
बिहू गिद्दा और भवाई
राधे रानी संग नाचे कन्हाई।

जीवन का खुश रंग दिखाई
धरती पावन मधुबन बनाई
मायूसी है दूर भगाई
भांत भांत की चुनरीया ओढ़े
आई रे आई
रानी बसंती आई।
आई रे आई
रानी बसंती आई।
                                            ।। भास्कर।।

Tuesday, April 21, 2020

रणभूमि

क्रंदन क्रंदन है जग में
व्याप्त भय का 
स्पंदन है रग रग में
जिधर देखो कौतूहल मचा है
लाशों का बस अंबार लगा है
त्राहि-त्राहि से नभ पटा है 
महामारी का प्रकोप मचा है।
इससे अधिक न सह पाऊंगा ।
और तनिक ना लिख पाऊंगा ।।

भय से छिपे हुए हैं घर में
विचरा करते थे जो
नगर नगर में ,
शोर शराबा था जो जग का,
शोक समाचारों से भरा पड़ा है ,कब का ।
मंदिर बंद मजारे बंद है,
अट्टालिकाओं के द्वारे बंद है ।
इससे अधिक न सह पाऊंगा।
और अधिक ना कह पाऊंगा ।।

आओ प्रण ले अपने मन में,
डटे पड़े हैं वीर जो रण में,
मृत्यु से जो लड़ते हर पल दाएं बाएं
कर्मभूमि धूमिल ना उनकी हो जाए।
साथ हमारा उनका होगा
अब हर घर से रण बिगुल बजेगा
लक्ष्मणरेखा रणभूमि अपनी
रण से तनिक न घबराऊंगा ।।
इससे तनिक न कर पाऊंगा , 
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा।
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा ।।

सोचा करे

मिल गया है मुझे ,
अब ख़ाक क्या सोचा करे ।
 
हल्की सी बारिश में ,
अब मन को क्यों फिका करे ।
 
क्यों करे चाहत जवाहर की ,
शीत में मोती
धारा पर यूं हीं बिखरा करे ।।

कोहरे की चादर में था जो 
अंगड़ाती धूप में 
अब क्यों सोचा करे ।।

इस गुलाबी सी उषा से 
काहिर मन- बदन को सींचा करे ।

मिल गया है मुझे "भास्कर"
ख़ाक सर्द से ठिठुरा करे ।।

Wednesday, April 15, 2020

रणभूमि


क्रंदन क्रंदन है जग में
व्याप्त भय का
स्पंदन है रग रग में
जिधर देखो कौतूहल मचा है
लाशों का बस अंबार लगा है
त्राहि-त्राहि से नभ पटा है
महामारी का प्रकोप मचा है।
इससे अधिक न सह पाऊंगा ।
और तनिक ना लिख पाऊंगा ।।

भय से छिपे हुए हैं घर में
विचरा करते थे जो
नगर नगर में ,
शोर शराबा था जो जग का,
शोक समाचारों से भरा पड़ा है ,कब का ।
मंदिर बंद मजारे बंद है,
अट्टालिकाओं के द्वारे बंद है ।
हृदय विदारण ना सह पाऊंगा।
और अधिक ना कह पाऊंगा ।।

आओ प्रण ले अपने मन में,
डटे पड़े हैं वीर जो रण में,
मृत्यु से जो लड़ते हर पल दाएं बाएं
कर्मभूमि धूमिल ना उनकी हो जाए।
साथ हमारा उनका होगा
अब हर घर से रण बिगुल बजेगा
लक्ष्मणरेखा रणभूमि अपनी
रण से तनिक न घबराऊंगा ।।
इससे तनिक न कर पाऊंगा ,
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा।
रणभूमि छोड़ नहीं जाऊंगा ।।

 ।। अंजनी भार्गव भास्कर ।।

Saturday, April 11, 2020

जल रहा मेरा शहर है।

किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है
क्यों यह फैली है उदासी
कैसा ये विस्मय में प्रहर है ।
कैसी है फैली बदहवासी
ना जाने आने वाले
किस जलजले का ये डर है।।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।
दिख रहा ना कोई आंखों मे
क्यों दुबके हुए चारों प्रहर हैं।
सूने सूने पड़े हैं रास्ते
फैला विष हवा में
लग रहा मातम का शिविर है।।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।

डर का ये कैसा भवर है
खौफ का हर तरफ क्यों
पसरा हुआ मंजर है ।
धुंध काली है बदी में 
दिख रहा ना रह गुजर है।
मौन में है क्यों खड़ी
रोती हुई क्यों शब सहर है
थी अभी जो शाह सी
आज विधवा बेसंंवर है।
किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।

बेसुधी है जहां में
खा रही बरबादियां है।
बंद पड़े  हैं घरों में दर सभी ।
मर रही उनकी सिसकारियां है।
लूटे जा रहे है क्यो
जो सहमे से है , बे-घर बे-शहर  हैं।
पड रही है कम कबरे,
दे रहा कोई नहीं क्यों खबर है।
ये किस तरह की आग में जल रहा मेरा शहर है।।