एक सवाल है तुमसे
हरदम कहता है यूं
क्या तुम ,तुम ही हो
या फिर मैं भी हूं तुझमें
क्या तुम ही हो
या फिर मात्र चेतना
जो भी हो शायद
पर वो हो जो
हर पल मेरा था और मैं उसका....
क्यों है घना अंधेरा
क्या वो तुम ही हो जो
जल रहे हो मद्धम मद्धम
या फिर मैं भी हूं उसमें
जो पल पल मिट रहा है हरदम
वह जो उठ रही चमक
क्या वह दीपक तुम ही हो या,
मैं भी हूं तुममे
वह बाती जलती सी
जिसकी वजह से हो तुम
क्यों विपिन है भीगा भीगा
बिखरे हो क्या यहां
चमक उषा हो या कण शीता की
या तुम मोती वसुंधरा की
क्या तुम ही हो केवल "रत्ने"
या फिर मैं भी हूं
जिस से लिपट कर
तुम माणिक सजे
क्या फिर से तुम
तुम ही रहोगे
या कभी कहोगे
मैं ,मैं नहीं तुम ,तुम नहीं
बस केवल हम तुम।