क्या लिखूं
कहते हो कुछ तो लिखो मुझ पर
क्या कहूं
तुम ही मेरी कविता हो
शायद देता तुम्हें कोई उपमा
पर
मेरे लिए तुम अनुपमा हो ।
क्या लिखूं कहते हो कुछ तो लिखो ।।
मैं तो बस एक पतवार
पर तुम ही मेरी मझधार हो,
मैं जो अब तक था
नीःरस
तुम ही तो मेरा श्रृंगार हो।।
करता तुम्हारी तुलना
किसी मूरत से,
पर तुम तो जीवन रस का भंडार हो।
क्या लिखूं तेरे लिए
तुम तो मेरे जीवन का आधार हो ।।
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