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Tuesday, May 15, 2012

अनजाना सफ़र अनजानी मंजिल

अनजाना सफ़र अनजानी मंजिल !


सपने संजोये मैंने पलकों में ,
एक सुनहरा सपना देखा ।।
हाथ लिए हाथों में उनका ,
मैंने यूँ
संग अपना देखा
देखा ख्वाब जब थे हम...
था मै ,वो थे और बस थी तन्हाई ,
समां वो शाम का ,
जब करीब वो मेरे मेरे आई ,
पास थे तो बस हम दो ,
दूर जा रही थी परछाई
उंच- नीच और अड़क सा रास्ता,
हाथ पकड़ कर उनका, चल रहा था हँसता हँसता

साथ ना जाने कब छुटा,
हाथ ना जाने कब छुटा ,
मोड़ भरी थी ऐसी रहें ,
ना जाने कब रूठ गया ,
आँखों से वो सपना झूठा
बन पानी बह गए सपनो के मोती
ख्वाब सुनहरा टूट गया,
कोई जब अपना छुट गया
एक किनारे खड़े रहा था मै ,
दूजे पर वो कूच गया
चला अकेला राह निभाने ,
राहों पर दिल मेरा टूट गया

समेट टुकड़े ,बना गान्ठ्ली ,
चुन अनजाना डगर फिर अनचाही मंजिल बनाई।

चलता राहों में तनहा हमेशा ,
संग संग ले तन्हाई ,
पहुँच गया फिर ऊँची चोटी को ,
जहा पहुँच पाने की ,किसी के ना मन में आई

दूर उठा कर नज़र जब देखा ,
जा रहे थे वो ,ले संग एक नया हमराही ,
मै तो पहुँच नहीं अब सकता ,
मंजिल उनसे कुछ यूँ दूर बनाई
उगता सूरज देख अब करू तमन्ना ,
मै ना सही ,जा छुले जाकर उनको मेरी परछाई

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