अजनबी राहे , दूर है मंजिल ,
चलते चल , बढ़ते चल ,
जब तक कदम साथ दे ॥
जब तक कदम साथ दे ,
साथ दे ना कोई , ना कोई हाथ दे ,
बढा खुद के हौसले को ,
सड़क का छोर पाना है ॥
राहें कटती ही नहीं , दूरी बढाती ही जाए ,
लम्बा ये सफ़र काटे ना कट पाए ।
मंजिल खड़ी देखे रस्ता राही का ,
देखे कब आकर वो मुझे गले लगता है ।
थक कर रुक ,
रुक कर मुड़ जाता है,
या फिर दे क़दमों को हौसला ,
मेरी ओर चला आता है ॥
चल आ राही ,चलता रह तु,
थकाना ना तु , डरना ना तु ,
अब तो उदय हुआ है तेरा ,
मंजिल की राहों पर आज ही तो पड़ा है पाँव तेरा ।
या हो काटें , या हो छाले ,
गिरता पड़ता खुद को तु ही संभाले ।
सर उठा कर देख मेरा साया ,
वापस ना लौटा जो इतना करीब आया ,
तोड़ सारे बंधन को ,
आ मेरी ओर चला आ ,
चलते आना है तुझको मुझ तक ,
मैंने ही है तुझको अपना अभिमान चुना ॥
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