कहने को तो बहुत कुछ है पर कुछ कहता नहीं। बहुत कुछ कहे बिन सब कुछ बोल जाता हूँ और बहुत बोलते हुए भी कुछ नहीं कहता ।
जब दिल उदास रहता है तो बस किसी सच्चे दोस्त के पास न होने का गम करता हूँ फिर दूजे ही पल होठो पर मुस्कान आती है और कलम सी सच्ची दोस्त मेरे हाथो में होती है । दोस्त तो कहते है तेरे दिल में बहुत प्यार बसा है किसी की खातिर , पर मेरे खंडहर से दिल में जब वो झरोखे से देखते है तो वो ही दोस्त कहते है यहाँ तो सिर्फ दर्द है ।
अन्दर की महसूस करने की शक्ति मैंने खो दी है ,पर न जाने क्यों पन्नो पर सिर्फ भावनाए ही बहती है । खुद से ही सवाल करता हु और खुद ही जवाब खोजता हूँ । बस इन्ही उलझनों में उलझा हुआ एक अनसुलझा अफ़साना हूँ मै ।
*भास्कर*
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