एक चाँद वो अकेला
तन्हा काले आकाश से,
अपनी सम्पति बिखेरता ।।
जलता खुद सूरज की तपिस में,
शीतल चांदनी भू पर उझेलता ।
ना आता जब वो नभ पर ,
अम्बर काला, धरती काली
शाया भी है मुह फेरता । ।
एक चाँद वो अकेला
शीतल प्रकाश पसेरता॥
संकट से वो लड़ता ,
पल-पल वो घटता बढ़ता ।
काल पक्ष रहे मुँह निकले ,
जाकर उसको भी संभाले ।
वापस आता लड़ता- पड़ता ,
शीतलता सत-कर्म की बिसेरता।
वो चाँद ! रहता खुद अन्धकार में
जग में फिर भी प्रकाश बिखेरता ।।
करता ना वो भेद किसी से ,
चाहे करना हर कोई उसकी हानि ।
सर्वदा करे धरा प्रकाशित ,
दे-दे ग्रहण चाहे धरती बे-ईमानी ।
धेर्य संभाले कर्तब्य पथ पर बढ़ता जाए ,
क्षति करते शत्रु भी घबराए ।
कृष्ण पक्ष भी गाल में रख कर ,
रक्षक उसका बन जाए ।
बन चाँद जो निष्ठा दिखाए ,
विधाता भी उसकी सज्जा सवेरता ।
देवो से भी सम्मानित हो ,
शिव के सर का सम्मान बटेरता ।।
एक चाँद वो तनहा
सब पर चांदनी बिखेरता । ।
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