मन में बसा एक सवाल हो तुम .
चित्त जो खोजता , वो जवाब हो तुम...
क्या हो तुम ???
प्रश्नों की एक अलबेली सी कड़ी हो ...?

या फिर अवरक्त प्रकाश की लड़ी हो तुम ...
कौन हो तुम ? हर श्वास में बस तू ही है समाता !!!!!!
हो तुम दर्शक , या फिर दर्पण ....?
या फिर सुप्त ह्रिदयो का स्पंदन !!
क्या हो तुम ....? हो तुम एक अद्भुत शीतल सी सिहरन !!!
भावों का तार तार है तुझको अर्पण ..........!!
ना जाने कैसा तुझसे ये कैसा नाता .....
बिना ध्याये तुमको , रहा ना जाता

प्रेम विवश ये भाव जगे
एक रूप , एक मन ,एक जीवन
कर दू सब तुझको समर्पण .....!!!!
एक अलौकिक तू , तू ही श्रीष्टी का सृजन !!
तुम बिन रहा ना जाता
रोम रोम में बसे हो तुम ,
श्रधा की एक ज्योत अल्लोकिक , ध्यान धरे तू मन में
जगाता !!!!हे ईश्वर !!! तुझसे ही तो मेरा जनम जनम का नाता !!!
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