Lovely world

Friday, March 23, 2012

संवाद :इंसान और परछाई



हमने ये तो सुना है की सुख में सब साथी होते है और दुःख की घडी में कोई साथ नहीं देता । मतलब सुख है तो सब अपने । प्रकाश है तो परछाई भी आपकी साथी है पर जब रोशनी ढलती है तब वो भी साथ छोड़ जाती है ।
अपनी आस पास की दुनिया में इंसान का स्वाभाव भी इसी परछाई की तरह होता है। इंसान तब तक ही किसी के पास रहता है जब तक की उस आदमी के पास प्रकाश हो , अन्धकार में वो आस-पास फटकता भी नहीं ।
ठीक उसी तरह प्रकाश में भी उसकी फितरत छाया की तरह होती है । जब किसी इन्सान के पास सुख-सम्पदा रुपी प्रकाश सूरज की भांति सर पर होता है तब छाया रुपी इन्सान भी उसके पास दोपहर की परछाई की भांति पास और पास आता चला जाता है । ठीक उसी तरह जब समृधि का सूरज ढलने लगता है (शाम की तरह) तब इन्सान जो छाया है आपसे दूर होते चले जाते है ।
इंसान का ये स्वार्थीपन ही इसकी सफलता की और फिर पतन का कारण है । सफलता की चोटी पर तो वो पहुच जाता है जहा से उसे सारी दुनिया अपने ही आगोश में दिखाती है । वह ये मान लेता है की सारी दुनिया उसकी ही है ,पर जब चोटी पर देखता है तो खुद को अकेला ही पता है । जहा पर समृधि का सूरज सर पर होते हुए भी उसकी छाया को उसके पास आने का स्थान नहीं मिलता । फिर शुरू होता हैं "पतन" जिसका बिज उसने खुद ही पहले बो रखा था ।

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