Lovely world

Wednesday, April 18, 2012

एक कली डाल से टूट गई

डाल झंझोड़ी इस तरह
काल हवा ने फिर ,
फिर एक कली डाल से टूट गई
हसरते खिलने की ,
महकने की , फलने की ,
आज फिर डाल से रूठ गई
सोचती तरू
खिलती मेरी भी सुन्दरता ,
मै भी बनती फिर संपन्न-सुवर्णा ,
पर आई ऐसी आंधी ,
अरमानो को बिंध गई
आज फिर एक कली ,
डाल से छुट गई
कली तो कुछ ना कह सकी
लेकिन जाते देख उसे ,
डाल ना आंखे मींच सकी।
तड़पती ,तरसती , सिसकिया लेती
बंधी भूमि पर जड़ो से ,
चाह कर भी ना बाजु पसेरती
बार बार काल के प्रहार से,
कठुह हृदय वो बन चली
फिर अगला मौसम आएगा ,
अगले बहार के इंतजार में ,
तरु फिर से पलकों को सींच गई
आज फिर एक कली डाल से टूट गई

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