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Saturday, March 08, 2014

विरहन



विरहन
जो अगर शब्दो के जाल बुन पाती ,
बातो की गाठे बांध कर,
हंसीन ख्वाबो की दुनिया मे,
जहा भावो कि तार के सरगम तले
सोचा जो कभी , ले जाने को तुम्हे ,
पा लेने का जाल बनाती ॥
जो अगर शब्दो के जाल बुन पाती......!!

जो नज़रो के तीर चला पाती,
तेरे मिची-मीची नज़रो के ढाल तोड्ने की खातिर ,
तिरछी नैनो के कटार चलाती।
प्रेम बाण चला कर
तेरे कठूह हृद्य को छ्ल जाती।
लहु हृद्य से जो बहा सके ,
वैसा अस्त्र बना पाती।
वर्षा कर देती फिर तुझ पर जो अगर नज़रो के तीर चला पाती॥

जिस बहाव मे तु बह सके ,
वो धार कहा से मै लाऊ ?
जो अगर मै बुंदे होती ,
तेरे तन- मन पे मै गिर जाती,
ना रिमझिम तो फिर ,
बहती बहती तुझमे मिल जाती।
जो मै ना अभी बंधी होती लज्जा से ,
तो तुझसे शायद मै वो सब कह पाती....
ना ताल , ना बर्षा , मै धारा सी बह आती ॥
प्रेम के समुंदर मे मै ,
फिर तुझसे घुल- मिल जाती ॥
काश ! तुमको मै ये समझा पाती !!!




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