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Friday, October 26, 2012

राधिका -व्यथा

 पनघट पर पनीया भरे गुजरी ,
मोहन ले गुलाल गुलेल बाट टोहे ।
ले मटकी चले ,राधा चाल मतवारी ,
मार कंकड़ मटकी ,तोड़े श्याम बनवारी ।
सर पकडे ,अरज़े राधा,
छोड़ ! काहे छेड़े मोहे बीच राहे ।।

बरबस काहे तंग करे , काहे मोको सताए ,
लाज लीन्ही मोरी ,लाज लीन्ही मोरी ,
काहे मालती बदरंग बनाए ।
कैसो ढीठ लाज़ बिना को , देख  मेरे पिछु -पिछु आए ।
अरज करू ओ! सावरे, काहे  मोको बिन मतलब सताए ?
कासे कहु मै ,मोको गिरिधर कितना सताए?
पकड़त कलईया बरबस ,चुडिया सब झड जावे ।
मतवारो खींचत चुनर , बेसरमी तोहे लाज न आए !
 हार गई पईया पडू तोहे , बिच कड़ी लाज मोरी,
छोड़ ! काहे छेड़े मोहे बीच राहे ।।

मधुर -मधुर बंसी बाजे ,
यमुना तीरे अकेले बुलावे ।
डर लागे , फिर भी लाज त्यागे ,
कैसो कीन्हो जादू ,राधा छिपत -छिपत आवे ।
पडत पईया ,आँखे मूंदे छलकत जावे ,
कर जोड़े , अरज करे ,
काहे खेल खेले लाज से मोरी ,
छोड़ ! काहे छेड़े मोहे बीच राहे ।
काहे मोको इतना सतावे !!

                                                                                                      ।।भास्कर ।।

 

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