यही कुछ दूर
पहले
अपना शहर छोड
आया हुँ ।
अपनो को छोड
आया हूँ ,
अपनापन छोड आया
हुँ ।
अलग जो है अब , तब से ,
जहां मेरा जुडाव था ।
अपने ही हाथों ,
अपना लगाव तोड़ आया हुँ
।
यादो मे जो था मेरे बसा
यादो का वो बहाव मोड़
आया हूँ ।
यही कुछ दूर
पहले
अपना शहर छोड
आया हुँ ।
पक्का धागा ना सही ,
रिस्तो का झिना झिना बुनाव छोड आया हुँ ।
भाग दौड़ मे दो रोटी की खातिर
आसमान कीं होड़ करते
उड़ते परों का ख्वाब छोड आया हुँ ।
मंगता हूँ जवाब
थोडा जवाब दे ,
ओ
शहर ,
क्यूँ पहचान वाले इस शहर कि खातिर
अपनी पहचान छोड आया हुँ ?
यही कुछ दूर पहले
अपना शहर छोड आया हुँ ।
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