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Tuesday, October 06, 2015

रात को जब कोई सोता है .......

कही रात को जब कोई सोता है
अक्सर एक द्वन्द् सा होता है,
बंद पलको मे ना जाने क्या-क्या संजोता है?  
आज कि तपिस, कल की भगद्ड से दूर
छूपाये अरमानो के सपनो मे सोता है ।
देखता है वो सब उन अंधेरी रातो कि साये मे
जो सब उसका सपना था
या फिर वो जो कभी अपना था !   
कहते है सपना तो निंदे उडा दे
उठ फिर पल्को को सेता है ।
दूर कही रात की खमोशी मे,
जब कोई सोता है।

देखता है वो खुद को लडखडते और चलते हुए
शायद गीरते और सम्भलते हुए।
कल रात कि तरह फिर आज वो सहमा सा मुस्कुराता है ।
डर! ना जाने किसका उसे और क्यो सतता है ?
राहो मे चक्कर सा खा जाता है ।
झट से उठ जाता है !
करवट बदल कर फिर सो जाता है ।

पिरोता हर आने वाले कल के मनके ,
हर रात अरमानो के हार बनाता
शायद फिर अपने और अपनो कि खातिर जीने के ख्वाब सजाता है ।
खुस हो वो इन रातो की दुनिया मे चैन से सो जाता है
तभी !
सवप्न का विह्ग्म लोक कही दूर छुट जाता है
प्यासा वो जग जाता और फिर  उठा कटोरा
दो घुट पी कर पानी कि     
छोड स्वप्न लोक
कल कि चिंता लिये मन मे फिर से करवट बदल कर सो जाता है ॥
                                                                                                                                                                     ॥ भास्कर  ॥




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