तनहा लौटा हु आज ,
अपनी वफ़ा पर खरा उतर कर ।
दे दिया उसे वो
जो कभी ,
नहीं नहीं ,
अभी - अभी अपना हुआ था।
अपना था वो ,
जो कब से पलकों का सपना था .
जब आई लबो पे ,
तो वो बस - बेबस सा कर गई ।
फिर ,
मायूस लौटा हु मै ,
अपने वादों पे खरा उतर कर ॥
ख्यालो के सदके ,
ख्वाबो में बस एक ,
हंसी की ही तम्मना थी ,
पर ,
अश्को की थैली भर कर
तनहा लौटा हु आज ,
अपने आप में खरा उतर कर ॥
॥ भास्कर ॥
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