Lovely world

Sunday, June 23, 2013

दोहरा स्वांग

चाहत तो है बहुत , खुसी की
पर गम है जो , अब छोडे नहीं बनता |
मंजिल तो लिए  इस दिल में ,
पर तनहा भी तो नहीं ,
देखो ये रस्ता |
डरता हु उस मंजिल की खुसी से
जहा पहुँच कर
अपनो को न खो दु ,
कही उनके क़र्ज़ का कर्ज़दार न हो जाऊ !
 दर्द का , एकतार  न बन  जाऊ |
ना अब ना होगा ,
इस दोहरे स्वांग में जीना ,
डर डर कर , सब अपनो को खोना |
मंजिल दूर भले हो जाए ,
संग अपनो का  ना छोड़ पाऊ ,
क्या जानो वो व्यथा ,
जब लक्ष्य  ले  अकेला मर जाऊ |

नहीं नहीं | मंजिल तब तक ना हो ,
जब तक हो साथ अधुरा |
हाथ बढ़ा खड़ा रहा हु ,
नजरो से उनको ताक रहा हु  ,
देखे - देखे  कौन - कब  हाथ बढ़ाएगा ?
मेरे साथ अब कौन ,
किसने  साथ मंजिल तक का निभाना है ?
या फिर तनहा ही दे जोर  अंधेर डर को ,
कदम -कदम बढ़ाना है |||     
                                                                                                     || भास्कर ||

No comments:

Post a Comment