चाहत तो है बहुत , खुसी की
पर गम है जो , अब छोडे नहीं बनता |
मंजिल तो लिए इस दिल में ,
पर तनहा भी तो नहीं ,
देखो ये रस्ता |
डरता हु उस मंजिल की खुसी से
जहा पहुँच कर
अपनो को न खो दु ,
कही उनके क़र्ज़ का कर्ज़दार न हो जाऊ !
दर्द का , एकतार न बन जाऊ |
ना अब ना होगा ,
इस दोहरे स्वांग में जीना ,
डर डर कर , सब अपनो को खोना |
मंजिल दूर भले हो जाए ,
संग अपनो का ना छोड़ पाऊ ,
क्या जानो वो व्यथा ,
जब लक्ष्य ले अकेला मर जाऊ |
नहीं नहीं | मंजिल तब तक ना हो ,
जब तक हो साथ अधुरा |
हाथ बढ़ा खड़ा रहा हु ,
नजरो से उनको ताक रहा हु ,
देखे - देखे कौन - कब हाथ बढ़ाएगा ?
मेरे साथ अब कौन ,
किसने साथ मंजिल तक का निभाना है ?
या फिर तनहा ही दे जोर अंधेर डर को ,
कदम -कदम बढ़ाना है |||
पर गम है जो , अब छोडे नहीं बनता |
मंजिल तो लिए इस दिल में ,
पर तनहा भी तो नहीं ,
देखो ये रस्ता |
डरता हु उस मंजिल की खुसी से
जहा पहुँच कर
अपनो को न खो दु ,
कही उनके क़र्ज़ का कर्ज़दार न हो जाऊ !
दर्द का , एकतार न बन जाऊ |
ना अब ना होगा ,
इस दोहरे स्वांग में जीना ,
डर डर कर , सब अपनो को खोना |
मंजिल दूर भले हो जाए ,
संग अपनो का ना छोड़ पाऊ ,
क्या जानो वो व्यथा ,
जब लक्ष्य ले अकेला मर जाऊ |
नहीं नहीं | मंजिल तब तक ना हो ,
जब तक हो साथ अधुरा |
हाथ बढ़ा खड़ा रहा हु ,
नजरो से उनको ताक रहा हु ,
देखे - देखे कौन - कब हाथ बढ़ाएगा ?
मेरे साथ अब कौन ,
किसने साथ मंजिल तक का निभाना है ?
या फिर तनहा ही दे जोर अंधेर डर को ,
कदम -कदम बढ़ाना है |||
|| भास्कर ||
No comments:
Post a Comment