दो पल जीने की राह ने ,
क्या- क्या दिखलाया है !!
अपनो को अपनो की खातिर ,
हर तरह ...!
अपनो से गैर बनाया है !
कर .....!!
छोटे से अभिमान का ,
बड़े- बड़े औदो ने चुकाया है ।
डंके की चोट पर बजता ,
उसका अटखेल उड़ाया है ।
दो पल जीने की राहो ने
जाने क्या - क्या दिखलाया है !!!
प्रेम न बसता , द्वेष न बसता ,
द्रवित ह्रदय ना हो पाया ,
व्यर्थ ही !
जाने क्या खोता , क्या पता ,
पथिक ने हर भाव से खुद को गवाया है ।
जीता मृत भावो में हर दम
व्याकुलता का साया है !!!
शायद ! ये ही दो पल ...
जीने की राहो ने
हर पल में , पल पल मरना दिखलाया है !!!!
॥ भास्कर ॥
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