जब चलते चलते राहों पर पदचिन्ह धुंधला जाऐगे ,
तब राहो से कर दोस्ती ,
मंजिल सामने लाएँगे ।
उम्मीद से जब नाता लगे मुड़ने,
यादो में खो कर ,
सहारा ए उम्मीदी बंधाएंगे ।।
आसू ना रुकने दे ,बह जाने दो अवसादों को ,
नजरो में
तब ही तो नव-कमल खिल पाएँगे ।
थक हार कर, छुपती -छिपाती पलछिने ,
खिलखिलाते पास आ जाएंगी ।
पथिक !
राहो से दोस्ती कर ,
मंजिल सामने ले आएँगे ।
दूर हो जब सवेरा ,
दीखता न हो ,बस हो घना अन्धेरा ,
एक दीप लिए आशा का ,
छोटा सा आशियाना तब जगमगाएंगे !
रोक सकेगा तो रोके रवि
किरण स्वयं हम बरसाएँगे ।
भूल पद-चिन्हों को,
स्वार्णिम स्व-चिन्ह बनाएगे ।।
"भास्कर "
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